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सुपौल : पत्रकार का दर्द : सच लिखने वाले पत्रकारों की पीड़ा और संघर्ष | Rajesh Kumar Ranjan

Rajesh Kumar Ranjan / Tue, May 26, 2026 / Post views : 109

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पत्रकार का दर्द

राजेश कुमार रंजन

Founder, Editor & Chief Reporter

Supaul Dastak News

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन आज सच लिखना और दिखाना पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है। हर शब्द पर निगरानी, हर सवाल पर दबाव और हर सच के पीछे खतरे की आहट महसूस होती है। इसके बावजूद कई पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर समाज के सामने सच्चाई लाने का काम कर रहे हैं।

इसी संघर्ष और पीड़ा को दर्शाती यह कविता पत्रकारों के दर्द, साहस और जिम्मेदारी को शब्द देती है।

सच लिखना अब आसान कहाँ,

हर शब्द पर पहरा रहता है,

जो आईना समाज को दिखाए,

वही सबसे ज्यादा सहता है।

कलम उठी तो सवाल उठे,

सत्ता को यह मंजूर न था,

जो सच जनता तक पहुँचा दे,

उसका बच पाना दूर न था।

भीड़ के बीच अकेला पत्रकार,

अपनी जान हथेली पर रखता है,

कभी धमकी, कभी अपमान,

फिर भी सच लिखता रहता है।

उसकी आवाज दबाने को,

झूठ का शोर मचाया जाता है,

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को,

सरेआम डराया जाता है।

लेकिन कलम कभी झुकती नहीं,

सच की लौ बुझती नहीं,

जितना दबाओगे आवाज को,

उतनी बुलंद होकर निकलती है वहीं।

पत्रकार सिर्फ एक नाम नहीं,

जनता की उम्मीद होता है,

उसकी लड़ाई खुद के लिए नहीं,

हर बेबस की जीत होता है।

जो सच के रास्ते चलते हैं,

उनका दर्द कोई क्या जाने,

घाव छुपाकर मुस्कुराते हैं,

फिर भी सच के गीत सुनाने।

सलाम उन कलमकारों को,

जो हर डर से लड़ जाते हैं,

सच की खातिर इस दुनिया में,

खुद दर्द सहकर भी लिख जाते हैं।

निष्कर्ष

यह कविता सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उन पत्रकारों की भावनाओं और संघर्ष का आईना है जो हर परिस्थिति में सच को सामने लाने का साहस रखते हैं। समाज को जागरूक रखने वाले ऐसे सभी कलमकार सम्मान के पात्र हैं।

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