आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जितिया व्रत रखकर नवमी को किया जाता है पारण।
सुपौल दस्तक न्यूज, सुपौल/बिहार
जितिया को लेकर नहाय- खाय के नियमों का पालन के साथ महिलाओं ने शनिवार को उपवास रखकर संतान की लंबी आयु के लिए कर रही है कामना।
मां की ओर से अपने संतान की लंबी आयु के लिए किए जाने वाला कठिन व्रत में शुक्रवार को नहाय खाय के साथ शुरू हुआ शनिवार की सुबह सूर्योदय से पहले महिलाओं ने भगवान श्रीजीउत वाहन को फल प्रसाद दही चुडा चढाकर पूजा अर्चना किया। परंपरा के अनुसार वहीं प्रसाद चील और सियारिन को भी चढ़ाया जाता है।
महिलाएं उपवास रहकर संतान की लंबी उम्र की कामना करती है। इस व्रत को जिउतिया, जितिया, जीवित्पुत्रिका व्रत, जीमूतवाहन व्रत नाम से जाना जाता है। यह व्रत इसलिए कठिन माना जाता है कि इसमें महिला तीन दिन तक उपवास रखती है। इस व्रत में जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है। पंचांग के मुताबिक प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जितिया व्रत किया जाता है। हर सुहागिन स्त्रियां यह व्रत रखती है। 2 अक्टूबर शुक्रवार को यह पर्व नहाए खाए के साथ शुरू हुआ और रात्रि में सूर्य उदय से पहले महिलाओं द्वारा फल प्रसाद जीउत वाहन को चढ़कर माता अपने पुत्र को खिलाया स्वयं भी प्रसाद का ग्रहण किया।
शनिवार 3 अक्टूबर को पूरे दिन भर एवं रात निर्जला व्रत करेगी।
दिन में निर्जला उपवास रखकर स्त्रियां शाम में स्नान करके डाली भरती है। डाली में फल प्रसाद मिठाई के साथ जीमल पेड़ का पत्ता, बास का पत्ता, अन्य सामान रखकर नए कपड़े से बांधकर मान के पत्ते से ढक दिया जाता है। रविवार की सुबह सूर्योदय से पहले महिलाओं द्वारा कपड़ा से बंधी हुई डाली को अपने पुत्र के हाथों से खुलवाती है।
उसके बाद महिलाओं के द्वारा जल ग्रहण किया जाता है।
पुरानी मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि उतरा में गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए श्री कृष्ण ने अपने सभी उन कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था और तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती है। धार्मिक कथाओं के मुताबिक बताया जाता है कि एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी उसी पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थी दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया। और भगवान श्री जीउतवहान की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारिक की मृत्यु हो गई और उसके दास संस्कार में सियारिन को भूख लगने लगी थी मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उनका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया।
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