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गढ़वा : जिसे मृत मानकर कर दिया था अंतिम संस्कार, वह 12 साल बाद जिंदा लौटा

Rajesh Kumar Ranjan / Thu, Jul 16, 2026 / Post views : 91

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पढ़कर रोना नहीं कभी-कभी जिंदगी ऐसी कहानी लिख देती है, जिस पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। राजस्थान के भरतपुर से सामने आया एक मामला कुछ ऐसा ही है, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। एक ऐसा व्यक्ति, जिसे परिवार ने 12 साल पहले लापता होने के बाद मृत मान लिया था, जिसका सात साल पहले प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर दिया गया था और जिसकी पत्नी वर्षों से विधवा का जीवन जी रही थी, वह अचानक एक दिन जीवित मिल गया।इस भावुक पुनर्मिलन ने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी। वर्षों से बिछड़ा पति अपनी पत्नी और बेटे से मिला तो वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। इस पूरे घटनाक्रम में भरतपुर की सामाजिक संस्था अपना घर आश्रम की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है, जिसने उपचार और पहचान की प्रक्रिया के बाद परिवार को फिर से एकजुट करने में मदद की।

जानकारी के अनुसार, मूल रूप से झारखंड के गढ़वा जिले के रहने वाले सुनील कुमार लगभग 12 वर्ष पहले अपनी बहन से मिलने बिहार के छपरा गए थे। इसी दौरान वह अचानक लापता हो गए।परिजनों ने काफी तलाश की, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं मिला। उसी समय क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने परिवार की चिंता और बढ़ा दी। लंबे समय तक खोजबीन के बावजूद जब उनका कोई पता नहीं चला, तो परिवार ने आशंका जताई कि संभवतः वह बाढ़ में बह गए होंगे।समय बीतता गया, लेकिन सुनील का कोई पता नहीं चला।कई वर्षों तक लगातार खोजबीन करने के बाद परिवार ने आखिरकार यह मान लिया कि सुनील अब इस दुनिया में नहीं हैं।बताया जाता है कि स्थानीय सामाजिक परंपराओं के अनुसार करीब सात वर्ष पहले उनका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। परिवार ने धार्मिक रीति-रिवाज पूरे किए और उन्हें मृत मानकर जीवन आगे बढ़ाने की कोशिश की।यह फैसला परिवार के लिए बेहद दर्दनाक था, लेकिन वर्षों तक कोई जानकारी न मिलने के कारण उन्होंने यही मान लिया कि सुनील अब कभी वापस नहीं आएंगे।

पति के लापता होने और बाद में प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार के बाद उनकी पत्नी अमरावती देवी ने सामाजिक परंपराओं के अनुसार विधवा का जीवन अपनाया।बताया जाता है कि उन्होंने अपनी चूड़ियां उतार दीं, मांग का सिंदूर मिटा दिया और केवल सफेद साड़ी पहनना शुरू कर दिया।परिवार के लोगों के अनुसार उन्होंने वर्षों तक यही जीवन जिया और उम्मीद लगभग छोड़ दी थी कि उनका पति कभी लौटेगा।इस पूरे मामले का सबसे भावुक पहलू तब सामने आया जब परिवार में बेटे के विवाह की तैयारी हुई।बताया जाता है कि शादी के निमंत्रण पत्र में पिता के नाम के आगे "स्वर्गीय" लिखकर कार्ड छपवाया गया, क्योंकि परिवार पूरी तरह विश्वास कर चुका था कि सुनील अब जीवित नहीं हैं।किसी ने भी कल्पना नहीं की थी कि एक दिन वही व्यक्ति अचानक उनके सामने जीवित खड़ा होगा।

कहानी में नया मोड़ तब आया जब हरियाणा के अंबाला रेलवे स्टेशन पर एक गंभीर रूप से बीमार और लावारिस व्यक्ति मिला।जानकारी के अनुसार, अपना घर आश्रम की रेस्क्यू टीम को वह व्यक्ति अत्यंत कमजोर और बीमार अवस्था में मिला। बताया गया कि वह टीबी (क्षय रोग) से पीड़ित था और स्वयं चलने-फिरने की स्थिति में भी नहीं था।संस्था की टीम उसे तत्काल अपने संरक्षण में लेकर उपचार के लिए भरतपुर स्थित आश्रम ले आई।

कई दिनों तक इलाज और देखभाल के बाद जब उसकी तबीयत में सुधार हुआ, तब उसने अपना नाम सुनील कुमार बताया।

उसने अपने गांव, परिवार और अन्य जानकारियां भी संस्था के पुनर्वास विभाग को दीं।इसके बाद संस्था ने उपलब्ध जानकारी के आधार पर संबंधित प्रशासन और पुलिस की मदद से उसके परिवार की तलाश शुरू की।

पहचान की पुष्टि होने के बाद अपना घर आश्रम ने झारखंड पुलिस के सहयोग से सुनील के परिवार से संपर्क किया।

जब परिवार को बताया गया कि सुनील जीवित हैं, तो शुरुआत में किसी को इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ।बाद में पुष्टि होने पर उनकी पत्नी अमरावती देवी और बेटा भरतपुर पहुंचे।जब वर्षों बाद पिता और पुत्र आमने-सामने आए तो भावनाओं का ऐसा दृश्य बना, जिसे देखकर वहां मौजूद लोग भी खुद को रोक नहीं पाए।

जिस बेटे ने बचपन में अपने पिता को खो दिया था, वह अब जवान हो चुका था।दोनों एक-दूसरे के गले लगकर लंबे समय तक रोते रहे।बताया जाता है कि आश्रम के डॉक्टर, कर्मचारी और स्वयंसेवक भी इस भावुक दृश्य को देखकर भावुक हो गए।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे मार्मिक क्षण तब आया जब वर्षों से विधवा का जीवन जी रही अमरावती देवी ने अपने जीवित पति के सामने दोबारा सिंदूर लगाया।बताया जाता है कि उन्होंने लाल साड़ी पहनकर अपने पति का स्वागत किया। अपना घर आश्रम लंबे समय से लावारिस, बेसहारा और मानसिक या शारीरिक रूप से असहाय लोगों के उपचार और पुनर्वास का कार्य करता रहा है।संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार उनका उद्देश्य केवल मरीजों का इलाज करना ही नहीं बल्कि जहां संभव हो, उन्हें उनके परिवारों से दोबारा मिलाना भी है।सुनील कुमार का अपने परिवार से पुनर्मिलन संस्था के लिए भी एक बेहद भावनात्मक उपलब्धि माना जा रहा है।

यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी बताती है कि कई बार लापता व्यक्तियों की तलाश वर्षों बाद भी सफल हो सकती है।विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के लापता होने के बाद लंबे समय तक कोई जानकारी न मिले, तब भी पहचान, पुनर्वास और सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से कई परिवारों को दोबारा मिलाया जा सकता है।भरतपुर में सामने आया यह मामला किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता। 12 वर्ष पहले लापता हुआ एक व्यक्ति, जिसे परिवार ने मृत मान लिया था, वर्षों बाद जीवित मिला। पत्नी, जिसने विधवा का जीवन अपना लिया था, फिर से अपने पति के साथ खड़ी नजर आई और बेटा, जिसने अपने पिता को बचपन में खो दिया था, वर्षों बाद उनसे गले मिला। यह पूरी घटना न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि उम्मीद कभी पूरी तरह खत्म नहीं होती। कई बार जिंदगी सबसे असंभव लगने वाली कहानियों को भी सच कर देती है।

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